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Shri Krishna 27 May Episode 25 : जब इंद्रदेव की पूजा बंद करवा दी श्रीकृष्ण ने

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निर्माता और निर्देशक रामानंद सागर के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 27 मई के 25वें एपिसोड ( Shree Krishna Episode 25 ) में बरसाने के वृषभानुजी अपनी पत्नी कीर्ति अर्थात राधा की मां को बताते हैं कि गोकुल से नंदरायजी का न्योता आया है। राधा की मां राधा की चोटी बनाते हुए कहती हैं क्यों? तब वृषभानुजी कहते हैं पूरणमासी के रोज उन्होंने पूरी बिरादरी का भोज रखा है। उसी दिन कृष्ण और बलराम दोनों का तुलादान होगा।
रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा


राधा यह सुनकर प्रसन्न हो जाती है और श्रीकृष्ण के खयालों में खो जाती है। वह खयालों में श्रीकृष्ण को कहती है कि अब देख लो अपनी इच्‍छा से नहीं आ रही हूं। तुम्हारी मैया ने न्योता भेजा है। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैया के न्योते में इस बार मेरी इच्छा थी तुमसे मिलने की। कालिया नाग के फन पर नाचते वक्त मुझे तुम्हारी बहुत याद आ रही थी।
उधर, नंदबाबा के आसपास बलराम और श्रीकृष्ण एक साथ बैठे होते हैं। सभी समाज और बिरादरी के लोग एकत्रित होकर एक जगह बैठे रहते हैं। श्रीकृष्ण के पीछे राधा बैठी मुस्कुरा रही होती है। सामने यशोदा मैया और रोहिणी मैया बैठी रहती हैं और दूसरी ओर वृषभानुजी अपनी पत्नी के साथ बैठे रहते हैं। एक ओर पुरोहितजन यज्ञ और तुलादान की तैयारी कर रहे होते हैं।

तभी एक ऋषि कहते हैं नंदरायजी अब श्रीकृष्ण को बुलाइये। भगवान श्रीकृष्ण को तराजू के एक पलड़े में बैठा दिया जाता है। दूसरे में हीरे जवाहरात रख दिए जाते हैं लेकिन श्रीकृष्ण के वजन से पलड़ा उनका ही भारी रहता है। नंदबाबा ये देखकर हैरान रह जाते हैं। तब वे कहते हैं कि एक थैला और लाओ। तब मोतियों की एक थाल रख दी जाती है लेकिन फिर भी पलड़ा बराबर नहीं होता है। तब नंदरायजी मैया यशोदा की ओर देखने लगते हैं। फिर वे कहते हैं एक थैला और लाओ। राधा और श्रीकृष्ण मुस्कुराते रहते हैं।
मोतियों से भरे उस दूसरे थैले से भी कुछ नहीं होता है तो यशोदा मैया, रोहिणी और नंदबाबा आश्चर्य से हैरान परेशान हो जाते हैं। पुरोहित भी ये देखकर हैरान रहते हैं कि कान्हा में इतना वजन कैसे? तब नंदबाबा कहते हैं और थैले लाओ। और लाए जाते हैं उनसे भी कांटा हिलता तक नहीं है। सभी थाल समाप्त हो जाते हैं तब यशोदा मैया उठकर एक एक करके अपने सारे गहने निकालकर रख देती हैं। उनके आसपास दाऊ और राधा भी खड़े हो जाते हैं।
फिर धीरे से दाऊ राधा के पास जाकर उन्हें प्रणाम करते हैं। राधा समझ जाती है। फिर राधा उन्हें अपने बालों में लगी वेणी के फूल तोड़कर दे देती हैं। दाऊ वे फूल लेकर तराजू के दूसरे पलड़े पर रख देते हैं। पलड़ा एकदम से झुककर नीचे जमीन से लग जाता है और श्रीकृष्ण ऊपर हो जाते हैं। सभी प्रसन्न होकर मुस्कुराने लगते हैं।

तब नंदबाबा पूछते हैं ये क्या था, कैसा चमत्कार है ये? यह सुनकर यशोदा मैया राधा की ओर देखने लगती हैं। नंदबाबा फिर से पूछते हैं, दाऊ भैया ये क्या था? तब दाऊ भैया कहते हैं कि ये एक दिव्य प्रेम का उपहार था। दिव्य प्रेम का उपहार? तुम दोनों के कौतुक हमारी समझ में नहीं आते। यह कहकर नंदबाबा श्रीकृष्ण को तराजू से नीचे उतार लेते हैं।
फिर श्रीकृष्ण अकेले में राधा से कहते हैं कि हम हार गए राधे। धरती पर यह हमारी पहली हार थी। परंतु इस हार में भी कितना आनंद आया। तब राधा कहती हैं कि आपने मेरी फूल-पत्ती की लाज रख ली, यही आपकी उदारता है। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि हम तो भावना के मूल्य में बिक जाते हैं। फिर राधा कहती हैं कि और हमारे पास भावना के अतिरिक्त कुछ नहीं बचा।... तभी राधा को उनकी मां पुकारती है। जाते हुए राधा कहती हैं कि एक बार हमारे बरसाने में अपनी चरणधूली डालिये। तब श्रीकृष्‍ण कहते हैं अवश्य।
फिर एक ऋषि महर्षि शौनिक और अन्य ऋषिगण को भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की महिमा का वर्णन करते हैं और कहते हैं कि जब शुकदेव मुनि ने भगवान के द्वारा गोवर्धन पर्वत को एक हाथ पर उठाने की कथा आरंभ करते हुए कहा, ये लीला उन्हें देवराज इंद्र का अहंकार भंग करने के लिए करनी पड़ी। तो महाराज परीक्षित ने पूछा, देवताओं का राजा इंद्र तो प्रभु का परम भक्त है उसे अहंकार क्यों हो गया? तब शुक मुनि ने अहंकार की शक्ति की व्याख्या इस प्रकार की। फिर शुक मुनि काम, क्रोध, मोह और लोभ की बात करने के बाद कहते हैं कि अहंकार ऐसा सूक्ष्म दोष है जिसका पता ही नहीं चलता। इंद्र को एक दिन ऐसा लगने लगा कि सारे संसार को केवल उन्हीं की पूजा करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने जब ये देखा तो उन्होंने इंद्र के अहंकार का मर्दन करने का निश्चत कर लिया।
उधर, एक दिन गोकुल में सभी लोग नंदबाबा के साथ एक उत्सव का आयोजन करते हैं तो दाऊ के साथ श्रीकृष्ण पूछते हैं कि बाबा आज गोकुल में किस उत्सव की तैयारी चल रही है? तब नंदबाबा बताते हैं कि आज बहुत बड़ा इंद्र यज्ञ होगा क्योंकि आज देवराज इंद्र की पूजा करने के लिए ही ये सारी तैयारियां हो रही हैं। तब नंदबाबा कहते हैं कि लल्ला महामुनी अवनिश को प्रणाम करो। श्रीकृष्ण उन्हें प्रणाम करते हैं। फिर नंदबाबा कहते हैं कि आज की ये इंद्र पूजा इन्हीं के हाथों सम्पन्न होगी। ये इधर से जा रहे थे तो हमने इन्हें इस पूजा के लिए रोक लिया।
तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये इंद्र हमारा क्या करता है बाबा जिसके लिए आप उनकी पूजा करते हैं? यह सुनकर माता यशोदा और नंदबाबा को अच्छा नहीं लगता है। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैंने तो सुना है कि वो एक विलासी देवता है जो केवल राग-रंग में घिरा हुआ मोज-मजा करता रहता है? तब नंदबाबा कहते हैं कि नहीं-नहीं कान्हा देवताओं के लिए ऐसा नहीं कहते, देवता नाराज हो जाते हैं और फिर भगवान इंद्र तो देवताओं के राजा हैं और वो मेघों के भी स्वामी हैं। वो मेघ जो जल बरसाते हैं और जिस जल से अन्न की उत्पत्ति होती है और उसी अन्न से हम सब अपना जीवन निर्वाह करते हैं। इसलिए वर्षा ऋतु के आगमन के पूर्व हम ये पूजा करके उन्हें प्रसन्न करते हैं।

तब श्रीकृष्ण पूछते हैं कि और यदि इस प्रकार उनकी पूजा न की जाए तो? तब नंदबाबा कहते हैं कि तो अवश्य देवता क्रोधित हो जाएंगे। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि क्रोध में आकर क्या करेंगे? यह सुनकर एक ग्रामीण कहता है क्या करेंगे ये पूछते हो? वो बादलों का राजा क्रोध में आ गया तो उसकी आज्ञा से ये सब सुंदर, श्यामल बादल आकाश छोड़कर चले जाएंगे। ये भूमि जल की एक-एक बूंद को तरसेगी। धान तो छोड़ो खास का एक तिनका भी नहीं उगेगा।
यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो ऐसा निर्दयी है उसे भगवान कैसे कह सकते हैं? बाबा भगवान तो उन्हें कहते हैं जो अपने भक्तों की भूल क्षमा करने वाले हों और जो दयालू हों। यह सुनकर वहां सन्नाटा छा जाता है तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि मुझे तो ये इंद्र भगवान नहीं लगता। उसकी पूजा करो, उनके नाम का यज्ञ करो तो वर्षा करेंगे। ना करो तो बादलों को हटा लेंगे। ये तो किसी व्यापारी के लक्षण है, भगवान के नहीं। मेरी मानों तो पूजा ही करनी है तो सच्चे भगवान की करो। जिनकी दृष्टी में पापी या महात्मा सभी एक समान है। उनकी करूणा के बादल सब पर एक समान बरसते हैं। उन अविनाशी भगवान की आराधना करो।
यह सुनकर नंदबाबा थोड़ा चिंतित होकर कहते हैं कि ये सारी बातें ठीक है लल्ला, परंतु भगवान इंद्र को क्रोध आ गया तो उनके वज्र के एक प्रहार से ही हम सबकी मृत्यु हो सकती है। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह मिथ्‍या भय है बाबा। याद नहीं गुरुदेव ने एक बार कहा था कि अपने-अपने कर्मों के अनुसार ही हर प्राणी की मृत्यु का समय निश्‍चित है। इसलिए किसी इंद्र में ऐसी शक्ति नहीं जो निश्‍चित समय से पहले किसी प्राणी को मार सके। इसलिए उनसे डरना व्यर्थ है।
यह सुनकर मुनिराज कहते हैं कि तुम्हारी बात सच है कि हमें उस अविनाशी की ही पूजा करना चाहिए। परंतु उस एक परमशक्ति के अलावा भी कई तरह की शक्तियां हैं। हर कुल का एक देवता होता है। सांसारिक उन्नती और भौतिक कार्य कि सिद्धि के लिए अपने-अपने ईष्ट की पूजा करने की अनुमति शास्त्र भी देता है।

इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं कि आप ठीक कहते हैं मुनिराज परंतु ईष्टदेव किसे माना जाए? इस प्रश्न का उत्तर दीजिए तब मुनिराज कहते हैं कि जिसके द्वारा सांसारिक कार्य सिद्ध होते हैं और जिसके द्वारा जीविका आसानी से चलती है वह ईष्टदेव होता है। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि तो बस हम ग्वालों की आजीविका चलाने वाली तो केवल गाय है। इसलिए हमारी ईष्टदेवी तो केवल गऊ माता ही होगी और हमारी गऊ माता का भरण-पोषण अपनी घास, अपने जल अथवा अपने फलों के द्वारा करते हैं वही गिरिराज गोवर्धन हमारे ईष्टदेव हैं। इसलिए आज से हमें इंद्रयज्ञ को छोड़कर गिरि यज्ञ और गोयज्ञ का आरंभ करना चाहिए। इसीसे हम सबके मनोरथ सफल होंगे। बाबा हमारी गायों में सभी देवताओं का वास है और गोवर्धन गिरि स्वयं शालिग्राम है। कान्हा की ये बात सभी को पसंद आ जाती है और उस दिन इंद्र पूजा की जगह गऊ और गिरि पूजा होती है।
तब मुनिराज कहते हैं कि तुम सही कहते हो। गिरिराज को गोवर्धन स्वयं विष्णु के वक्ष से प्रकट हुए हैं ऐसा हमारे गुरु ने हमें बताया था इसलिए उनकी प्रदिक्षिणा करने आज हम यहां आए थे। नंदरायजी आपके चिरंजीवी ने भी वही रहस्य बताया है। नंदरायजी अब हम गोवर्धन की पूजा ही करेंगे चलो सभी वहीं। सभी वहीं चले जाते हैं।

सभी एकत्रित होकर गोवर्धन यज्ञ और पूजा करते हैं। यज्ञ समापन के अवसर पर अचानक गोवर्धन पर्वत में से एक ज्योति प्रकट होती है और फिर उसमें से एक देवता निकलकर कहते हैं कि हम गोवर्धन हैं। हे ब्रज निवासियों हम प्रसन्न होकर तुम्हें दर्शन दे रहे हैं। तब एक महिला कहती है कि अरे ये गोवर्धन देवता का मुखड़ा तो अपने कन्हैया जैसा लगता है। तब ललीता कहती हैं लगता तो है लेकिन इसकी तो चार भुजाएं हैं। फिर गोवर्धन देव कहते हैं कि यह नैवेद्य अग्नि कुंड में डालने की क्या आवश्यकता हम अपने हाथों से ही भोग लगा लेते हैं। तभी सभी के हाथों से फलों की थालियां छूटकर गोवर्धन देव के मुंह में चली जाती हैं और थालियों की जगह उनके हाथों में गहने आ जाते हैं। फिर सभी गोवर्धन को प्रणाम करके चले जाते हैं।
उधर, इंद्र सभा में एक दूत आकर कहता है कि प्रभु धरती पर आपकी पूजा अब बंद कर दी गई है। यह सुनकर इंद्र कहते हैं यह सत्य नहीं हो सकता। तब दूत कहता है कि यह सत्य है महाराज इस वर्ष गोकुल वालों ने यज्ञ में आपका और देवताओं का भाग नहीं दिया। यह सुनकर इंद्रदेव क्रोध में उठ खड़े होते हैं और कहते हैं ऐसी कुबुद्धि उन्हें किसने दी? तब दूत बताता है कि नंद के पुत्र कृष्ण ने दी है। अब वहां गाय और गोवर्धन की पूजा होगी। इंद्र कहते हैं कि कृष्ण? तुम्हारे कहने का अर्थ है कि अब वे देवताओं को छोड़कर पत्‍थरों और पहाड़ों की पूजा करेंगे? फिर इंद्रदेव कहते हैं कि स्वयं भगवान को भी स्वर्ग के राजा का आदार करना चाहिए। यह अवश्य की कोई छलिया है। अब स्वयं के साथ ही गोकुल वाले मरेंगे। तभी वहां सावर्तक नाम का एक कालासा आदमी प्रकट होता है जिसे इंद्र आज्ञा देते हैं कि तुम अपने सभी बादलों के साथ गोकुल में भयंकर तूफान और वर्षा का ऐसा तांडव रचो की सभी मारे जाए। सभी का समूल नाश कर दो। मैं भी ऐरावत पर तुम्हारे पीछे-पीछे आता हूं।
उधर, नंदबाबा और यशोदा अपने एक सेवक के साथ गोवर्धन पर्वत के चमत्कार की बात कर रहे थे तो दूसरी ओर दाऊ भैया और राधा के साथ श्रीकृष्ण भी यही चर्चा कर रहे थे। दाऊ कहते हैं कि अब तो युगों तक गोवर्धन पूजा के लिए लोग वृंदावन आते रहेंगे। तब राधा कहती हैं कि आपके विरह में इसके दर्शन से ही हम संतुष्ट हो लेंगे।

इस चर्चा के दौरान ही ब्रज पर भयानक काले बादल छा जाते हैं और तूफान प्रारंभ हो जाता है। सारे नगर में वर्षा और आंधी का तांडव शुरु हो जाता है। कच्चे मकान और गोशलाएं टूट जाती हैं। ऐरावत पर बैठा इंद्र यह देखकर प्रसन्न हो जाता है। कुछ ही समय में बाढ़ जैसे हालात हो जाते हैं। जय श्रीकृष्णा।
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